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शहीद सरदार मेजर हरबंस सिंह चहल।

सम्मान, शौर्य और साहस के प्रतीक, एक निडर महायोद्धा। एक सच्चे योद्धा, एक सच्चे नायक, एक सच्चे युद्ध नायक।

भारतीय सेना की 14 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में राष्ट्र के गौरव और सम्मान के लिए निःस्वार्थ भाव से अपने प्राणों की आहुति देकर “सर्वदा शक्तिशाली” की सच्ची भावना को साकार किया। उनका अमर बलिदान और विरासत आने वाली सभी पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत है, जो उन्हें जीने, सीखने और इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। इसलिए, चहल चौक उनकी इसी अमर विरासत की शाश्वत आत्मा और प्रतीक है, जो उनके महान शौर्य, नेतृत्व और वीरता को दी गई एक अमर श्रद्धांजलि के रूप में स्थापित है।

शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल का जीवन-परिचय: एक अमर नायक

प्रारंभिक जीवन:

शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल का जन्म 6 दिसंबर 1938 को राजस्थान के श्री गंगानगर के मोहनपुरा गाँव में सरदार अवतार सिंह चहल और सरदारनी दलीप कौर के घर हुआ था।

उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा मोहनपुरा के स्कूल में पूरी की और 1956 में खालसा हाई स्कूल, श्री गंगानगर से स्नातक हुए। बचपन के उन दिनों में भी, मेजर चहल अपने स्कूल के सबसे प्रसिद्ध और विशेष छात्रों में से एक थे।

प्रभावशाली और ऊर्जावान युवाकाल:

प्रतिष्ठित बिड़ला आर्ट्स कॉलेज, पिलानी से बी.ए. की डिग्री पूरी करने वाले मेजर चहल स्कूल और कॉलेज दोनों में एक उच्च श्रेणी के खिलाड़ी थे। 1961 में, उन्हें बिड़ला आर्ट्स कॉलेज, पिलानी में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया गया। उसी वर्ष, उन्हें कॉलेज यूनियन का उपाध्यक्ष भी चुना गया। 1962 में, उन्हें युवा छात्रावास संघ (Youth Hostel Association) का उपाध्यक्ष चुना गया, जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री बरकतुल्लाह खान इसके अध्यक्ष थे।

1963 में, उन्होंने एम.ए., एल.एल.बी. के लिए प्रसिद्ध अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और उसी वर्ष उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैबिनेट के सदस्य के रूप में चुना गया, जो उस समय किसी गैर-मुस्लिम छात्र के लिए हासिल करना लगभग असंभव पद था। उन्हें राजस्थान विश्वविद्यालय की एथलेटिक्स चैंपियनशिप जीतने के लिए ‘यूनिवर्सिटी कलर्स’ से सम्मानित किया गया।

खेल प्रेमी:

मेजर हरबंस सिंह चहल का खेलों की शक्ति में दृढ़ विश्वास था, जो चरित्र निर्माण और संबंधों को मजबूत करने में मदद करती है।

मेजर चहल को किसी और ने नहीं, बल्कि महान मेजर ध्यानचंद, जिन्हें “हॉकी का जादूगर” कहा जाता है, ने प्रशिक्षित किया था। ध्यानचंद के मार्गदर्शन में, मेजर हरबंस सिंह ने अद्भुत प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए कई पुरस्कार जीते। उन्होंने अनुशासन, समर्पण और दृढ़ता के इन मूल्यों को अपनी सेवा और खेल के मैदान, दोनों में दर्शाया।

एक जीवन बदलने वाला निर्णय:

जब वह अपनी एम.ए., एल.एल.बी. की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्हें आपातकालीन कमीशन (Emergency Commission) के माध्यम से भारतीय सेना में चुना गया। उन्होंने 8 फरवरी 1964 को भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून से कमीशन प्राप्त किया और 1966 में जबलपुर से रेगुलर कमीशन में चुने गए। वह फरवरी 1964 से जुलाई 1965 तक ग्रेनेडियर रेजिमेंटल सेंटर, नसीराबाद में रहे। सेवा में शामिल होने के बाद भी, उन्होंने दिल्ली में 1964-65 की अंतर-क्षेत्रीय दिल्ली-राजस्थान खेल प्रतियोगिता में डिस्कस थ्रो (चक्का फेंक) में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

राष्ट्र की सेवा में:

1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, वह जुलाई 1965 से मई 1968 तक 14000 फीट की ऊंचाई पर नेफा (NEFA) में तैनात रहे। वह मई 1968 में अपनी यूनिट के साथ जयपुर आ गए और फरवरी 1969 तक जयपुर में रहे।

उन्होंने नेफा में उच्च ऊंचाई युद्ध प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (High Altitude War Training Course) पास किया। उन्होंने मऊ इन्फैंट्री स्कूल में वेपन्स कोर्स और जेसी कोर्स पास किया।

वह फरवरी 1969 में अपनी यूनिट के साथ कश्मीर के राजौरी सेक्टर में चले गए और अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक वहीं रहे।

भारत-पाक युद्ध के दौरान, उन्होंने 4 दिसंबर से 11 दिसंबर तक पुंछ सेक्टर में दुश्मन सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दुश्मन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए, उन्होंने अपने जांबाज साथियों की टीम के साथ उनके सबसे बड़े हमले को विफल कर दिया। इसके बाद, उन्हें राजौरी सेक्टर से बुलाया गया और दुश्मन की एक बड़ी चौकी पर कब्जा करने के लिए कहा गया।

यह चौकी पाकिस्तान की सीमा के 2 मील अंदर 1700 फीट की ऊंचाई पर थी और वहां का तापमान शून्य से भी कम था। 13 तारीख की रात को, उन्होंने अपने जवानों के साथ दुश्मन की चौकी पर हमला किया। सामने से दुश्मन सेना ने भी हर तरह से हमले का जवाब देना शुरू कर दिया। दुश्मन के तोपखाने ने बड़ी संख्या में गोले दागने शुरू कर दिए। उनके मजबूत, शक्तिशाली और जोशीले हमले को देखकर दुश्मन का मनोबल तुरंत टूट गया और दुश्मन अपनी पहली दो छोटी चौकियों को छोड़कर भाग गया।

अंतिम युद्ध:

अज्ञात कारणों से हमारी तोपें रोक दी गईं, जिससे दुश्मन का हौसला बढ़ गया और दुश्मन बड़ी चौकी पर अपनी पकड़ मजबूत करने लगा।

मेजर चहल द्वारा हमला शुरू करने के बाद, शुरुआत में दुश्मन की एक गोली उनकी बाईं बांह में लगी, लेकिन वह अविचलित रहे और अपनी अद्भुत सहनशक्ति और शक्ति का परिचय दिया। कुछ समय बाद, एक बारूदी सुरंग फट गई और उनका एक पैर घायल हो गया। उस समय, उनके साथी सैनिक उनकी गंभीर चोट के कारण उन्हें वापस ले जाने पर जोर दे रहे थे, लेकिन मेजर चहल का इरादा चौकी पर कब्जा करने का दृढ़ था।

मेजर चहल का मानना था, “यदि मैं अभी चला गया, तो मेरे जवानों के साथ कौन लड़ेगा और चौकी पर कब्जा करने का लक्ष्य कौन पूरा करेगा? हमारी बटालियन का झंडा कैसे ऊंचा रहेगा? हमारी रेजिमेंट का नाम कैसे निष्कलंक रहेगा? मेरी चिंता मत करो, मैं ठीक हूँ। बहादुरी से आगे बढ़ते रहो, जीत हमारी ही होगी।”

मेजर चहल की कंपनी में अधिकांश सैनिक, उनके अपने वंश सहित, राजपूत थे, इसलिए घायल होने के बावजूद, उनका प्रेरणा देने का संकल्प अटल रहा। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “तुम महाराणा प्रताप के वंशज हो। तुम सभी वीर सैनिक हो, आगे बढ़ते रहो, हम अपने लक्ष्य के करीब पहुँच गए हैं, अब हम इसे जीतकर ही रहेंगे।”

अपने गंभीर घावों के बावजूद, वह लड़ते रहे और एक पैर के सहारे पहाड़ी पर चौकी की ओर एक किलोमीटर आगे बढ़े और गर्व से चौकी पर विजय का तिरंगा फहराया। उसी क्षण, एक तोप का गोला आकर गिरा और मेजर हरबंस सिंह चहल 14 दिसंबर 1971 को सुबह 5:30 बजे वीरगति को प्राप्त हुए।

शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल की निजी डायरी: एक अमूल्य धरोहर

शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल की बहुमूल्य निजी डायरी के संजोए हुए पन्नों में एक सच्चे नायक की अदम्य भावना की झलक मिलती है। ये हस्तलिखित शब्द, जिन्हें समय के साथ सहेज कर रखा गया है, कर्तव्य के प्रति उनकी दृढ़ प्रतिबद्धता और राष्ट्र के प्रति उनके अटूट प्रेम और निष्ठा को दर्शाते हैं। उनके अपने शब्दों में, मेजर चहल ने “पूर्ण सफलता प्राप्त करना या युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त होना” के अपने दृढ़ निश्चय को व्यक्त किया, जो उनके जीवन को परिभाषित करने वाले समर्पण, साहस और बलिदान का प्रतीक है।

ईमानदारी, स्पष्टता और दृढ़ विश्वास के साथ लिखी गईं डायरी की ये प्रविष्टियाँ, हमें उस निःस्वार्थ भावना की याद दिलाती हैं जिसके साथ उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान राष्ट्र के गौरव और न्याय के लिए पूरी निष्ठा से संघर्ष किया। हर एक शब्द एक ऐसे सैनिक की वीरता से प्रतिध्वनित होता है, जिसने पूरी निष्ठा से देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और अपने पीछे प्रेरणा, समर्पण और सम्मान की एक शाश्वत विरासत छोड़ गए।

एक नायक की शौर्य गाथा: तस्वीरों में कैद अमर क्षण

दुर्लभ यादों के इस विशेष संग्रह के माध्यम से शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल के जीवन और विरासत में झाँकिये। प्रत्येक तस्वीर उनकी महानता, वीरता और राष्ट्र के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की कहानी बयां करती है। वर्दी में गर्व के क्षणों से लेकर परिवार और साथियों के साथ संजोए गए अनमोल अवसरों तक, ये अमूल्य तस्वीरें एक सच्चे देशभक्त के जीवन की सुनहरी झलक प्रस्तुत करती हैं।

खेल भावना का उत्सव

खेल, अनुशासन, टीम भावना और सहनशीलता को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल न केवल एक सम्मानित सैनिक थे, बल्कि एक प्रतिभाशाली और उत्साही खिलाड़ी भी थे। इसलिए, एक सच्चे खेल प्रेमी के रूप में, उनका दृढ़ विश्वास था कि खेल चरित्र को आकार देने और आपसी संबंधों को मजबूत करने में मदद करते हैं।

यह खंड उनके मूल्यों को दर्शाने वाली जीवंत खेल संस्कृति को समर्पित है। इन तस्वीरों के माध्यम से हम उस आनंद, जुनून और एकता का उत्सव मनाते हैं जो खेल हमारे जीवन में लाता है, और यह भावी पीढ़ियों को उनकी उत्कृष्टता की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

चहल चौक की कहानियाँ और विचार

हमारे ब्लॉगों के इस विशेष संग्रह के माध्यम से चहल चौक की दुनिया में प्रवेश करें। यहाँ, हम शहीद मेजर हरबंस सिंह चहल के जीवन और विरासत को समर्पित प्रेरणादायक कहानियाँ, ऐतिहासिक पल और गहन विचार साझा करते हैं। उनके शौर्य पर चिंतन से लेकर सामुदायिक पहलों की नवीनतम जानकारी तक, हमारे ब्लॉग इस प्रतिष्ठित स्थल के अतीत, वर्तमान और भविष्य की एक झलक प्रस्तुत करते हैं। उन गाथाओं से जुड़ें जो हमें बलिदान, शौर्य और देशभक्ति की भावना से जोड़ती हैं।

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